हाइलाइट्स
- Tender Management के नाम पर SE और एक्सईएन की मिलीभगत उजागर
- भटौली मार्ग के ₹7 करोड़ के टेंडर में की गई गड़बड़ियों की पुष्टि
- प्रहरी पोर्टल के दुरुपयोग से चार योग्य फर्मों को किया गया बाहर
- SE डीके सिंह और एक्सईएन जनार्दन यादव पर चहेते ठेकेदार को फायदा पहुंचाने का आरोप
- पारदर्शिता की जगह अब साजिशें, PWD विभाग की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश में ‘Tender Management’ बना भ्रष्टाचार का नया चेहरा
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसमें Tender Management को लेकर पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे हैं। यह मामला ₹7 करोड़ के भटौली मार्ग निर्माण से जुड़ा है। आरोप है कि इस टेंडर को जानबूझकर कुछ चुनिंदा फर्मों के हित में मैनेज किया गया।
मुख्य अभियंता (SE) डीके सिंह और कार्यकारी अभियंता (XEN) जनार्दन यादव पर आरोप है कि उन्होंने अपने चहेते ठेकेदार को लाभ पहुंचाने के लिए प्रहरी पोर्टल का दुरुपयोग करते हुए 6 में से 4 योग्य फर्मों को बाहर कर दिया। इनमें संजय कंस्ट्रक्शन जैसी तकनीकी रूप से योग्य फर्में भी शामिल थीं।
क्या है पूरा मामला?
👉 भटौली मार्ग के निर्माण के लिए कुल ₹7 करोड़ का टेंडर निकाला गया था।
👉 प्रहरी पोर्टल के ज़रिए 6 फर्मों ने आवेदन किया।
👉 तकनीकी मानकों के अनुसार सभी फर्में योग्य पाई गईं।
👉 बावजूद इसके 4 फर्मों को जबरिया टेंडर प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
👉 संजय कंस्ट्रक्शन को भी बाहर कर दिया गया, जबकि उनके सभी दस्तावेज पूरे थे।
इस पूरे घटनाक्रम में Tender Management की भूमिका संदेह के घेरे में है। जानकारों का मानना है कि यह एक सुनियोजित साजिश है ताकि मनचाहे ठेकेदार को ही लाभ पहुंचाया जा सके।
अधिकारियों की मिलीभगत का सबूत: संजय कंस्ट्रक्शन का मामला
संजय कंस्ट्रक्शन के मालिक ने मीडिया को बताया कि उन्होंने समय पर सभी ज़रूरी दस्तावेज़ अपलोड किए थे और उनकी फर्म ने पिछली परियोजनाओं में भी बेहतर प्रदर्शन किया है। बावजूद इसके उन्हें टेंडर प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। यह स्पष्ट रूप से Tender Management के तहत पूर्व नियोजित निर्णय प्रतीत होता है।
उन्होंने कहा:
“हमने हर शर्त पूरी की, लेकिन फिर भी हमें बाहर कर दिया गया। यह पारदर्शिता की हत्या है और इसका जवाब अधिकारियों को देना होगा।”
प्रहरी पोर्टल का दुरुपयोग या तकनीकी खामी?
PWD विभाग का प्रहरी पोर्टल पारदर्शिता और निष्पक्षता की गारंटी देने के लिए बनाया गया था, लेकिन इस मामले में उसका इस्तेमाल ही ग़लत तरीके से किया गया। जानकारों का कहना है कि टेंडर निकालने और स्क्रूटनी की पूरी प्रक्रिया Tender Management सिस्टम के नाम पर अब ‘मैनेज’ की जाने लगी है।
विभाग के सूत्रों का कहना है कि:
“कुछ अधिकारियों ने पोर्टल का प्रयोग सिर्फ एक ही ठेकेदार को टेंडर दिलाने के लिए किया। यह गंभीर अनियमितता है।”
क्या कहता है PWD का टेंडर नियमन कानून?
PWD के नियमों के अनुसार:
- टेंडर प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी होनी चाहिए।
- किसी भी योग्य फर्म को बिना उचित कारण के बाहर नहीं किया जा सकता।
- सभी आवेदनों की निष्पक्ष तकनीकी जांच अनिवार्य होती है।
लेकिन इस केस में Tender Management का दुरुपयोग कर नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गईं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर तकनीकी बहानों का सहारा लेकर अपात्र ठहराने की योजना बनाई थी।
क्या होगी कार्रवाई?
PWD विभाग के उच्च अधिकारियों को जब इस घोटाले की भनक लगी तो उन्होंने जांच का आदेश दिया है। प्रारंभिक रिपोर्ट में Tender Management प्रणाली के दुरुपयोग की बात सामने आई है।
जांच कमेटी के एक सदस्य ने बताया:
“यह एक सुनियोजित मामला प्रतीत होता है। दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
इस बीच शासन स्तर पर भी हलचल है, और मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस प्रकरण की रिपोर्ट तलब की है।
जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं
इस घटना के बाद आम जनता में रोष व्याप्त है। लोगों का कहना है कि अगर Tender Management का यही हाल रहा तो गुणवत्ता और पारदर्शिता की बातें केवल किताबों तक सीमित रह जाएंगी।
पूर्व PWD अधिकारी और विशेषज्ञ इंजीनियर विनीत त्रिपाठी का कहना है:
“यह बहुत खतरनाक ट्रेंड है। टेंडर सिस्टम को पारदर्शी रखने के लिए तकनीक लाई गई थी, लेकिन अब वही तकनीक धांधली का ज़रिया बन रही है।”
Tender Management में सुधार की जरूरत
पारदर्शिता बढ़ाने के सुझाव:
- टेंडर की प्रक्रिया में थर्ड पार्टी ऑडिट अनिवार्य किया जाए।
- सभी आवेदकों को रिजेक्शन की स्पष्ट और सार्वजनिक वजह बताई जाए।
- प्रहरी पोर्टल को स्वतंत्र एजेंसी से ऑडिट कराया जाए।
- दोषी अधिकारियों को दंडित कर उदाहरण प्रस्तुत किया जाए।
क्या सच में ‘सिस्टम’ अब सिस्टमेटिक करप्शन की ओर बढ़ रहा है?
भले ही तकनीक ने सरकारी कार्यों को आसान बनाया हो, लेकिन अगर उसका इस्तेमाल निजी हितों को साधने के लिए किया जाए, तो वह भ्रष्टाचार का नया रूप बन जाती है। लखनऊ के इस केस में Tender Management के नाम पर जो कुछ हुआ, वह केवल एक उदाहरण है—लेकिन यह हमें सचेत करने के लिए काफी है।
अब सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले को दबा देगी या दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाकर मिसाल पेश करेगी?