Pilgrimage during periods

Pilgrimage during periods: पवित्र स्थान पर मासिक धर्म आ जाए तो क्या करें? प्रेमानंद महाराज का ऐसा जवाब जो सबको हैरान कर देगा!

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हाइलाइट्स:

  • Pilgrimage during periods के दौरान महिलाएं मंदिर या धार्मिक स्थल पर दर्शन कर सकती हैं या नहीं, यह बड़ा सवाल है।
  • हिंदू धर्मशास्त्रों और संतों की राय इस विषय पर अलग-अलग हो सकती है।
  • मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसे पवित्रता-अपवित्रता के चश्मे से देखने की जरूरत नहीं है।
  • संत प्रेमानंद महाराज के अनुसार, अगर दर्शन का अवसर जीवन में एक ही बार मिले, तो इसे छोड़ना नहीं चाहिए।
  • मंदिर दर्शन के दौरान कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।

तीर्थयात्रा के दौरान मासिक धर्म – धार्मिक दृष्टिकोण

भारत में तीर्थयात्रा का विशेष महत्व है। देशभर से हजारों श्रद्धालु हर वर्ष चार धाम यात्रा, काशी, वृंदावन, वैष्णो देवी और अन्य धार्मिक स्थलों पर दर्शन के लिए जाते हैं। लेकिन महिलाओं के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण अनुभव हो सकता है यदि उन्हें यात्रा के दौरान Pilgrimage during periods हो जाए।

हिंदू परंपरा में मासिक धर्म को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं। कई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को इस दौरान वर्जित माना जाता है। लेकिन आधुनिक दृष्टिकोण और कई संतों की राय इस पर अलग-अलग है। वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने इस विषय पर अपना मत व्यक्त किया और बताया कि ऐसी स्थिति में महिलाओं को क्या करना चाहिए।

क्या मासिक धर्म में भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं?

संत प्रेमानंद महाराज का मत

प्रेमानंद महाराज से एक महिला ने प्रश्न किया – “यदि किसी महिला को तीर्थयात्रा के दौरान मासिक धर्म हो जाए, तो क्या उसे मंदिर में प्रवेश करना चाहिए या नहीं?”

इस पर महाराज ने उत्तर दिया:

“दर्शन करने का सौभाग्य नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि मासिक धर्म एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अब अचानक ऐसी स्थिति आ गई और बार-बार आना संभव नहीं है, तो स्नान करके, प्रसादी चंदन लगाकर भगवान के दर्शन कर लेना चाहिए। हालांकि, सेवा या सामग्री अर्पित न करें और न ही किसी वस्तु को स्पर्श करें। लेकिन दूर से ही दर्शन अवश्य करें, क्योंकि पता नहीं, दोबारा यह अवसर मिले या न मिले।”

धार्मिक ग्रंथों में मासिक धर्म का महत्व

हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म को किसी महिला की पवित्रता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। संत प्रेमानंद महाराज ने बताया कि:

“मासिक धर्म कोई निंदनीय बात नहीं है, बल्कि यह तो वंदनीय बात है। यह महिलाओं द्वारा वहन किया गया एक दैवीय कर्तव्य है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, देवराज इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था, जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या का दोष लगा। इसे चार भागों में विभाजित किया गया – नदियों में फेन, वृक्षों में गोंद, भूमि में बंजरता, और महिलाओं में मासिक धर्म के रूप में। इसलिए इसे पवित्र और प्राकृतिक प्रक्रिया समझना चाहिए।”

क्या करें जब तीर्थयात्रा के दौरान मासिक धर्म आ जाए?

मंदिर प्रवेश से जुड़े नियम

  1. स्नान करें – शरीर को स्वच्छ बनाए रखने के लिए स्नान करना जरूरी है।
  2. दर्शन दूर से करें – मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश न करें, बल्कि दूर से ही भगवान के दर्शन करें।
  3. सेवा न करें – पूजा सामग्री अर्पित करने से बचें।
  4. शारीरिक श्रम से बचें – इस दौरान भारी कार्य न करें, जिससे स्वास्थ्य प्रभावित न हो।
  5. ध्यान और भजन करें – मानसिक रूप से भगवान का ध्यान करें और भजन-कीर्तन करें।

आधुनिक समाज में मासिक धर्म को लेकर बदलता नजरिया

समाज में मासिक धर्म से जुड़े मिथकों को तोड़ने के लिए कई जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। डॉक्टर और वैज्ञानिक इसे पूरी तरह से एक जैविक प्रक्रिया मानते हैं, जिसे किसी भी तरह की धार्मिक या सामाजिक वर्जना से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

अब समय आ गया है कि महिलाएं मासिक धर्म को लेकर किसी भी तरह की झिझक महसूस न करें और यदि वे Pilgrimage during periods के दौरान यात्रा कर रही हैं, तो आत्मविश्वास के साथ धार्मिक स्थलों पर जाएं और ईश्वर का स्मरण करें।

मासिक धर्म के दौरान तीर्थयात्रा करना एक व्यक्तिगत और धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। हालाँकि, धार्मिक ग्रंथों में इसे अपवित्र नहीं माना गया है। संत प्रेमानंद महाराज का भी यही मत है कि यदि दर्शन का अवसर बार-बार न मिले, तो दूर से ही सही, भगवान के दर्शन अवश्य करने चाहिए। साथ ही, इस दौरान मंदिर में सेवा या प्रसाद अर्पण से बचना चाहिए।

समाज में मासिक धर्म को लेकर बदलते नजरिए के साथ, यह आवश्यक है कि महिलाएं इस प्राकृतिक प्रक्रिया को सहजता से स्वीकार करें और बिना किसी झिझक के अपनी धार्मिक आस्थाओं का पालन करें।

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