Journalist Harassment

VIDEO: UP में Journalist Harassment की साजिश? सुप्रीम कोर्ट ने DGP से पूछा- पत्रकार ने सिर्फ खबर लिखी, फिर धारा 420 क्यों?

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हाइलाइट्स

  • 🔹 सुप्रीम कोर्ट ने Journalist Harassment पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई
  • 🔹 DGP को नोटिस: पत्रकार के खिलाफ Story लिखने पर IPC 420 जैसी धारा लगाने की वजह बताओ
  • 🔹 वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने पत्रकार की ओर से प्रभावी ढंग से पक्ष रखा
  • 🔹 राज्य के वकील ने भरसक दबाव बनाया, लेकिन कोर्ट नहीं हुआ प्रभावित
  • 🔹 पत्रकारों को डराने-धमकाने की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी चिंता

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी: “Journalist Harassment” अब बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज उत्तर प्रदेश सरकार को पत्रकारों के खिलाफ लगातार हो रही “Journalist Harassment” पर तीखा फटकार लगाया है। कोर्ट ने विशेष रूप से एक मामले में प्रतिक्रिया दी, जिसमें एक पत्रकार पर एक खबर लिखने मात्र से भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी) लगा दी गई।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य के DGP को नोटिस जारी करते हुए पूछा, “क्या अब सच्चाई लिखना भी अपराध हो गया है?”

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश के एक स्वतंत्र पत्रकार ने हाल ही में एक स्थानीय घोटाले पर रिपोर्टिंग की थी। इस रिपोर्ट में कुछ शक्तिशाली लोगों की संलिप्तता उजागर हुई थी। कुछ ही दिनों में उस पत्रकार पर धोखाधड़ी (IPC 420) सहित अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया।

इस मामले को लेकर पत्रकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि यह पूरा मामला सिर्फ Journalist Harassment है और उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई

इस मामले की सुनवाई के दौरान पत्रकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने मजबूती से पक्ष रखा। उन्होंने अदालत के समक्ष स्पष्ट किया कि यह मुकदमा पूरी तरह बदले की भावना से प्रेरित है, ताकि पत्रकारों को डराया जा सके और उनकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा सके।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामला पूरी तरह कानून के तहत है और इसमें कोई दमन नहीं किया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ।

कोर्ट की तीखी टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश ने सख्त लहजे में कहा:

“अगर कोई पत्रकार सरकारी व्यवस्था की आलोचना करता है या किसी घोटाले की रिपोर्टिंग करता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उस पर IPC 420 जैसी गंभीर धाराएं थोप दी जाएं। यह सीधा-सीधा Journalist Harassment है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, और इस स्तंभ को डराकर या दबाकर लोकतंत्र कमजोर होता है।

पत्रकारों के खिलाफ बनता “गैंग”?

पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में पत्रकारों के खिलाफ लगातार मुकदमे दर्ज किए जाने के मामले सामने आए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं न कहीं एक “Journalist Harassment गैंग” सक्रिय है, जो पत्रकारों को रिपोर्टिंग से रोकने की कोशिश कर रहा है।

अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि जब पत्रकार जनहित से जुड़ी खबरें लिखते हैं, तो उन्हें अपराधी बना दिया जाता है।

प्रेस की स्वतंत्रता पर मंडराते खतरे

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर पहले ही कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स चिंता जता चुकी हैं। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बेहद अहम मानी जा रही है।

Journalist Harassment न केवल पत्रकार को बल्कि समाज को सच्चाई से वंचित करने का प्रयास है। यदि पत्रकारों को डराया जाता रहा, तो यह पूरे लोकतंत्र के लिए घातक होगा।

क्या कहता है कानून?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है।

हालांकि यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और इसके कुछ सीमाएं हैं, लेकिन किसी पत्रकार को खबर लिखने पर IPC 420 जैसी धाराओं में फंसाना न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि यह न्याय का मज़ाक भी है।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पत्रकारों की स्वतंत्रता से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह में स्पष्ट करे कि एक स्टोरी लिखने पर Journalist Harassment का यह स्तर कैसे पहुंचा।

पत्रकारों ने जताई राहत और उम्मीद

इस फ़ैसले के बाद पत्रकार संगठनों और स्वतंत्र पत्रकारों ने राहत की सांस ली है। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट के इस कदम का स्वागत किया और इसे पत्रकारिता की जीत बताया।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा:

“जब न्यायपालिका पत्रकारों के साथ खड़ी होती है, तब सच्चाई की जीत होती है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन सभी के लिए उम्मीद की किरण है जो निडर होकर कलम चला रहे हैं।”

“Journalist Harassment” पर अब बर्दाश्त नहीं

यह मामला केवल एक पत्रकार का नहीं, बल्कि पूरे प्रेस जगत का है। सुप्रीम कोर्ट की यह कड़ी टिप्पणी भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकती है।

अब यह ज़रूरी हो गया है कि सरकारें Journalist Harassment के मामलों को गंभीरता से लें और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अनुकूल माहौल तैयार करें।

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