बाबासाहेब डॉ. भीमराव आम्बेडकर मनुस्मृति के प्रशंसक थे: दिलीप मंडल

 

नई दिल्ली: हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से लेखक दिलीप मंडल ने दावा किया कि भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन के एक चरण में मनुस्मृति की प्रशंसा की थी। इस विवादित बयान के समर्थन में मंडल ने बाबासाहेब के लेखन का एक संदर्भ भी प्रस्तुत किया, लेकिन इसे एक अस्पष्ट और धुंधले चित्र के रूप में साझा किया। इस दावे ने व्यापक बहस को जन्म दिया, जिसमें कई लोगों ने मंडल के कथन को आधारहीन और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया।

बाबासाहेब का रुख: मनुस्मृति और महिला अधिकार

डॉ. अंबेडकर ने अपने कार्यों और विचारों में स्पष्ट रूप से मनुस्मृति की निंदा की थी। 1927 में उन्होंने मनुस्मृति का सार्वजनिक रूप से दहन किया, इसे जातिवाद और स्त्री-विरोधी व्यवस्था का प्रतीक बताया। उनके लेखन और राजनीतिक कार्यों में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता जो यह दर्शाए कि वे मनुस्मृति के समर्थक थे।

डॉ. अंबेडकर के लेखन में स्मृतियों का तुलनात्मक अध्ययन मिलता है, जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया था कि मनुस्मृति में महिलाओं को संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा देने का उल्लेख है। लेकिन इस कथन को प्रशंसा के रूप में देखना ऐतिहासिक संदर्भों को गलत समझने जैसा है। उनका उद्देश्य स्मृतियों में महिलाओं की स्थिति के क्रमिक पतन को उजागर करना था।

दिलीप मंडल के दावे पर सवाल

दिलीप मंडल के दावों पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं:

  1. हिंदू कोड बिल: अगर डॉ. अंबेडकर मनुस्मृति के प्रशंसक थे, तो उन्होंने हिंदू कोड बिल में महिलाओं को संपत्ति का आधा अधिकार क्यों दिया?
  2. मनुस्मृति का विरोध: हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार करते समय उन्होंने मनुस्मृति या अन्य स्मृतियों के किसी भी प्रावधान को शामिल क्यों नहीं किया?
  3. त्यागपत्र का निर्णय: नेहरू सरकार से मतभेद के चलते उन्होंने इस्तीफा दे दिया, लेकिन उन्होंने महिलाओं के अधिकारों पर समझौता नहीं किया।
  4. "मॉडर्न मनु" उपाधि का विरोध: नवंबर 1948 में संविधान सभा में "मॉडर्न मनु" कहे जाने पर उन्होंने इसे अस्वीकार किया और इस उपाधि का पुरजोर विरोध किया।

दुष्प्रचार के खिलाफ सख्त रुख

सोशल मीडिया पर बाबासाहेब के विचारों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना उनके ऐतिहासिक योगदान का अपमान है। ऐसे प्रयास समाज को भ्रमित करने और व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए किए जाते हैं।

दलित समुदाय के प्रबुद्ध लोगों का मानना है कि इस विवाद में उलझने के बजाय शिक्षा, सशक्तिकरण और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित करना होगा कि बाबासाहेब के नाम पर कोई भी झूठा एजेंडा न चलाया जाए।

डॉ. अंबेडकर के विचार और उनका जीवन संघर्ष इस बात का प्रमाण हैं कि वे हमेशा समानता और न्याय के पक्षधर रहे। उनके नाम पर किसी भी प्रकार का दुष्प्रचार अस्वीकार्य है। समाज को इस प्रकार के झूठे दावों से सतर्क और सचेत रहने की आवश्यकता है।

(यह लेख बाबासाहेब के विचारों और उनके ऐतिहासिक कार्यों के दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित है।)

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