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गौतम बुध के भोजन के अंतिम दिनों की वह कहानी जिसको पढ़कर आप के छलक उठे नहीं आंसू

गौतम बुद्ध (जन्म 563 ईसा पूर्व – निर्वाण 483 ईसा पूर्व) एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ।
बुद्ध के अंतिम दिनों की बात है। एक दिन वे भोजन करने के लिए एक गरीब लुहार के यहां गए। लुहार इतना गरीब था कि बुद्ध को खिलाने और खुद खाने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, लेकिन बुद्ध का आतिथ्य वह पूरी श्रद्धा से करना चाहता था।
ऐसे में वह बरसात में लकड़ियों पर उगने वाली छतरीनुमा कुकरमुत्ते की सब्जी बड़े प्रेम से बना लाया। जहर से ज्यादा कड़वी सब्जी खाते रहे बुद्ध और वो पूछता रहा कैसी लगी?
बुद्ध मुस्कुराए तो उसने थाली में और सब्जी डाल दी। उसका प्रेम देख बुद्ध मुस्कुराते हुए पूरी सब्जी खा गए। देह में जहर फैल गया।
चिकित्सक ने बुद्ध का उपचार करते हुआ पूछा, आप सब जानते थे, फिर भी आपने उस लुहार को क्यों नहीं रोका?
बुद्ध बोले, मौत तो एक दिन आनी ही थी। मौत के लिए प्रेम को कैसे रोक देता? मैंने प्रेम को आने दिया, प्रेम को होने दिया और मौत को स्वीकार कर लिया। कल परसों में मरना ही था तो फिर प्रेम की कीमत पर जीवन को कैसे बचा सकता हूं?
ऐसा ही होता है प्रेम। आप प्रेमवश होकर जहर पी जाते हैं, खुद दुख उठाते हैं लेकिन प्रेम को होने देते हैं। प्रेम को खोजने आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं। आपको खुद के भीतर झांकना होता है।
हम सभी के भीतर हमेशा प्रेम-कलश भरा होता है। उसे बस प्रेम से छूने की देर होती है और वह छलकने लगता है। जब भी कोई प्रेम से पुकारता है, मन को छूता है, हमारा प्रेम-कलश भर जाता है।

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