Home Ajab Gajab भगवान कृष्ण के दीवाने यह मुस्लिम कवि काबुल से आकर बसे वृंदावन...

भगवान कृष्ण के दीवाने यह मुस्लिम कवि काबुल से आकर बसे वृंदावन में, आप भी नहीं जानते होंगे आइए जाने

श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के 8वें अवतार और हिन्दू धर्म के ईश्वर माने जाते हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता हैं। कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, एक आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्ज महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है।
हमारा भारत देश दुनिया के सबसे सुंदर देशों में से एक है।यहां मानवता और सभ्यता की अद्भुत मिसालें आपको मिल जाएंगी।यहां हज़ारों साल पुरानी संस्कृति आज भी कायम है।यहां जाती, धर्म मे अंतर होते हुए भी सभी एक दूसरे का सम्मान करते हैं।
आज हम आपको एक ऐसे मुस्लिम कवि के बारे में बताएंगे जो भगवान कृष्ण की भक्ति में दीवाना हो गया था।उनकी भक्ति के आड़े धर्म की दीवार नही आई थी।उन्होंने भगवान कृष्ण की ऐसी मनोहारी छवि का वर्णन अपने काव्य के जरिये किया कि हर कोई भक्ति से ओत प्रोत हो जाये।
हम बात कर रहे हैं महाकवि रसखान की।रसखान का असली नाम सैयद इब्राहीम खान था।इनका जन्म साल 1628 में अफगानिस्तान के काबुल शहर में हुआ था।वो वहां से चलकर यूपी के अमरोहा आकर बस गए।वहीं से उनका आना जाना मथुरा और वृंदावन होने लगा।और भगवान कृष्ण की कथाओं से वो इतने प्रभावित हुए की कृष्ण के अनन्य भक्त बन गए।
रसखान द्वारा भगवान कृष्ण के ऊपर लिखे गए दोहे और सवैये आज तक लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं।उनके मधुर दोहों के चलते भक्त उन्हें रसखान कहने लगे।
रसखान ने भगवान कृष्ण की बाल छवि का मधुर वर्णन करते हुए लिखा है-
“धूरि भरे अति शोभिय श्याम जी, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
खेलत खात फिरत अंगना, पग पैजनी बाजत पीरी कछोटी!
वा छवि को रसखान बिलोकत, वारत काम कलानिधि कोटि।
काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ से ले गयो माखन रोटी।”
अर्थात रसखान यहां कह रहे हैं कि बालक कृष्ण नंद बाबा के आंगन में धूल से सने हुए अठखेलियाँ कर रहे हैं।उनके सर पर सुंदर चोटी बंधी हुई है।और वो पीली कचोटी बांधे हुए हैं।रसखान कहते हैं कि भगवान कृष्ण की इस मनोहारी छवि पर वो हज़ारों कामदेवों की सुंदरता को न्योछावर कर देंगे।आगे लिखते हैं कि कृष्ण के हाथ मे एक माखन लगी रोटी है जिसे एक कौआ छीन कर उड़ गया।वो कहते हैं कि यह कौआ कितना सौभाग्यशाली है कि उसे उस परमपिता के हाथ से सीधे प्रसाद मिला जिसकी एक झलक पाने को ऋषि मुनि हज़ारों साल तक कठोर तप करते हैं।
इसी तरह रसखान ने खुद को अगले जन्म में भी भगवान कृष्ण के करीब रहने की प्रार्थना इस दोहे में करते हैं-
मानुस हौं तो वही रसखान, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर धारन।
जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥
इसी तरह रसखान ने भगवान कृष्ण की उपासना करते हुए अनेक दोहे लिखे और भगवान के सच्चे भक्त बन गए।वहीं वृंदावन में एक दिन उन्होंने अपना देह त्याग कर भगवान के श्रीचरणों में विलीन हो गए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here