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आखिर क्यों पूर्व जन्म के पाप के कारण भीष्म पितामह को मिली थी बाणों की शैया, आइए जाने हैरान कर देने वाली सच्चाई

भीष्म अथवा भीष्म पितामह महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक थे। भीष्म महाराजा शान्तनु और देव नदी गंगा की आठवीं सन्तान थे | उनका मूल नाम देवव्रत था। भीष्म में अपने पिता शान्तनु का सत्यवती से विवाह करवाने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने की भीषण प्रतिज्ञा की थी | अपने पिता के लिए इस तरह की पितृभक्ति देख उनके पिता ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दे दिया था | इनके दूसरे नाम गाँगेय, शांतनव, नदीज, तालकेतु आदि हैं।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण के बा अगर कोई महापराक्रमी और शूरवीर माना जाता है,तो वो हैं भीष्म पितामह, भीष्म गंगा के पुत्र थे, और बचपन में इनका नाम देवव्रत था, लेकिन अपने पिता की इच्छा को पूर्ण करने के लिए इन्होने भीषण प्रतिज्ञा ली और भीष्म कहलाये, भीष्म कुरुवंश की गद्दी के रक्षक के रूप में विख्यात रहे, जो भी उस गद्दी पर बैठा, भीष्म उसके लिए सदैव तत्पर रहे भीष्म के रहते हस्तिनापुर में किसी भी शत्रु के आँख उठाने की हिम्मत नही होती थी।
अपनी प्रतिज्ञा के चलते उन्होंने कभी हस्तिनापुर पर शासन नही किया, बल्कि अपने सौतेले भाइयों और उनके वशजों यानि कि पांडवों और कौरवों के लिए सदैव चिंतित रहे, जब महाभारत का युद्ध हुआ तब कौरवों के दुर्योधन हस्तिनापुर के सिंहासन पर विराजमान था, यही कारण है कि न चाहते हुए भी भीष्म को महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ ऐना पड़ा।
इस युद्ध में जब वो पांडवों की सेना का नाश कर रहे थे, तब उने मन ये पीड़ा रहती थी कि अपनी प्रतिज्ञा के कर्ण अनैतिक होते हुए भी उन्हें दुर्योधन का साथ देना पड़ रहा है, भीष्म इस बात से बहुत विचलित रहते थे और आखिरकार उन्होंने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बता दिया, इसके अगले दिन अर्जुन ने वही किया और भीष्म को तीर लगे, और उन्हें बाणों की शैया पर लेटना पड़ा।
जब भीष्म बाण शैया पर लेटे थे तो उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पास बुलाकर पुछा कि हे भगवन मुझे किस पाप के कारण ये बाणों की शैया मिली है, इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा।
आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गये क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था, करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, हे युवराज जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।
लेकिन हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया, लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे, जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका, इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का ‘श्राप’ आप पर लागू हो गया, और आज आपको इस शैया पर लेटना पड़ा।

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