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अंतिम संस्कार करके वापस लौटा पूरा गांव, पीछे से मरा हुआ शख्स भी आया वापस, गांव में मच गया हड़कंप…..l

पितृमेध या अन्त्यकर्म या अंत्येष्टि या दाह संस्कार 16 हिन्दू धर्म संस्कारों में षोडश आर्थात् अंतिम संस्कार है। मृत्यु के पश्चात वेदमंत्रों के उच्चारण द्वारा किए जाने वाले इस संस्कार को दाह-संस्कार, श्मशानकर्म तथा अन्त्येष्टि-क्रिया आदि भी कहते हैं। इसमें मृत्यु के बाद शव को विधी पूर्वक अग्नि को समर्पित किया जाता है। यह प्रत्एक हिंदू के लिए आवश्यक है।

 

शहर के जिस बेचन को मरा मानकर उसकी पत्नी व बेटियों ने अंतिम संस्कार कर दिया था, वह लॉकडाउन के बीच 18 वर्ष बाद घर लौट आया। उसे देखकर बेटियां चहक उठीं। बोलीं, अब सिर पर पिता का साया रहेगा। एक की शादी नवंबर में होनी है। जब बेचन कमाने गया था, तब बेटियां छोटी थीं। अब बड़ी हो गई हैं।
जंगल सालिकराम पादरी बाजार के बेचन परिवार के भरण-पोषण के लिए अक्तूबर 2002 में पंजाब गए। मेहनत, मजदूरी की लेकिन घर नहीं लौट सके। कुछ दिन बाद हरियाणा, फिर दिल्ली में मजदूरी करके अपना पेट भरते और फुटपाथ पर सो जाते। लॉकडाउन हुआ तो कामकाज बंद हो गया। खाने के लाले पड़ गए तो बेचन को अपना परिवार याद आया। वह ट्रक की मदद से 5 मई को पादरीबाजार आ गए। मायके जाने की वजह से घर पर पत्नी तो नहीं मिली, लेकिन दो बेटियों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
बेचन की चार बेटियां हैं। दो की शादी हो चुकी है। अब घर में दो बेटियां हैं। बेटियों के मुताबिक, बेचन 2002 में कमाने गए थे लेकिन उसके बाद घर नहीं लौटे। मां सहित पूरे परिवार ने मान लिया कि उनकी मौत हो गई। इसके बाद 2012 में पिता का प्रतीकात्मक पुतला बनवाया गया। फिर रिक्शे से ले जाकर जंगल धूसड़ के आगे तुर्रा नाला पर प्रतीकात्मक पुतले को आग लगा दिया। मान लिया कि अंतिम संस्कार हो गया।  मौत के बाद जो औपचारिकता होती है, वह भी पूरी की गई थी। अब पिता जिंदा लौट आए तो बेटियों की खुशी का ठिकाना नहीं है। हालांकि बेचन को पछतावा है। वह कहते हैं कि कामकाज के चक्कर में गोरखपुर घर नहीं लौट सके। बीच में तबीयत भी खराब हो गई थी। अब जिम्मेदारी का एहसास हुआ तो लौट आए हैं। अब यहीं काम करेंगे। बेटियों की शादी अच्छे घरों में करेंगे। बेटियों को जो प्यार बचपन में नहीं दे सके, वह अब देंगे।
पत्नी ने चौका-बर्तन करके बेटियों को पाला, दो की शादी भी की
पति के घर नहीं लौटने के बाद चिंता देवी के सामने बच्चियों के लालन-पालन की चुनौती खड़ी हो गई तो उन्होंने घर-घर चौका-बर्तन मांजना शुरू किया। बेटियों को पालकर बड़ा किया, फिर दो की शादी भी की। बड़ी बेटी अंजनी की कुशीनगर तो दूसरी अंजोरा की शादी जौनपुर में हुई है। तीसरी की शादी इसी साल नवंबर में होनी है।
सारी खुशियां नहीं मिलीं
बेचन भले ही 18 साल बाद लौट आए लेकिन उन्हें सारी खुशियां नसीब नहीं हुईं। नाराज पत्नी चिंता देवी घर छोड़कर चली गईं। उनका कहना है कि जब पति की जरूरत थी, एक-एक दाने और पैसे के मोहताज थे तो वे नहीं आए। अब काम नहीं मिला और खाने के लाले पड़े तो 18 वर्ष बाद लौट आए। ऐसे पति की जरूरत नहीं है, जो अपने घर और परिवार का ध्यान न रख सके।

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