प्रबुद्ध सम्मेलन: उत्तर प्रदेश भारत का ऐसा प्रदेश है जिसका ताल्लुक सीधा केंद्र की राजनीति पर आधारित होता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि दिल्ली की गद्दी उत्तर प्रदेश से होते हुए जाती है। इसका मुख्य कारण उत्तर प्रदेश में भारी संख्या में चाहे लोकसभा हो या फिर राज्यसभा की सीटों का होना है। 
उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले चुनाव के लिए सभी पार्टी जातीय ध्रुवीकरण की राजनीतिक खेल रही हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग सभी जातियों का अच्छा खासा प्रतिशत है और अगर कोई भी जाति खिसक कर दूसरी पार्टी में मिल जाती है तो उसी की सरकार बन जाती है। 

प्रबुद्ध सम्मेलन या उत्तर प्रदेश में जातीय राजनीति

उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति अन्य पिछड़ा वर्ग में खासकर यादव और कुशवाहा जाति के लोगों की तादाद काफी है। अभी इससे पहले मायावती ने ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन किया था। हालांकि बाद में लोगों के नाराजगी के चलते इस सम्मेलन को प्रबुद्ध वर्ग का सम्मेलन बताया गया। 
इस सम्मेलन में ब्राह्मण वोटों को रिझाने के लिए मायावती ने अपने कद्दावर नेता सतीश चंद्र मिश्र को जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में उथल-पुथल मच गई। क्योंकि ब्राह्मण समाज के लोगों की भारी भीड़ बसपा के प्रबुद्ध सम्मेलन में आने लगी तो भाजपा सहित सपा को भी चिंता सताने लगी। 
सतीश चंद्र मिश्र द्वारा प्रदेश के लगभग सभी जिलों में प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसके बाद लखनऊ में आकर मायावती ने भी प्रबुद्ध वर्ग के सम्मेलन को समापन करते हुए काफी वादे किए और ब्राह्मणों को रिझाने की काफी कोशिश की गई। 
हालांकि बसपा के प्रबुद्ध सम्मेलन में ब्राह्मणों की भारी भीड़ दिखाई दी किंतु अभी तक मैदान में ब्राह्मणों की मनसा क्या है। इसका पता किसी भी पार्टी ने नहीं लगा पाया। उधर समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण सम्मेलनों का आयोजन करने का विचार कर रही है और कई हिंदू देवताओं की मूर्तियां लगवाने का भी वादा कर रही है। 
हालांकि मायावती ने भी प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में कहा कि वह परशुराम जी की प्रतिमा को उत्तर प्रदेश में स्थापित करेंगी। मायावती का प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन खत्म हुआ इसके तुरंत बाद भाजपा ने भी अपने प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन के आयोजनों का शुरू कर दिया।  अब समझ में यह नहीं आता है उत्तर प्रदेश में लगभग 12 से 14 परसेंट ब्राह्मण किस तरफ रुख करेगा। 
ऐसा भी माना जाता है कि ब्राह्मण वर्ग जिस तरफ जाता है। उस पार्टी की ही जीत होती है। इसीलिए सभी पार्टी ब्राह्मणों को ही रिझाने में लगी हुई हैं। अब यह तय ब्राह्मणों को करना है कि उन्हें किस पार्टी में सम्मान मिलेगा और किस पार्टी में उनकी इज्जत होगी।  यह सोचने के बाद ही शायद ब्राह्मण वर्ग के लोग अपने पत्ते खोलेंगे। 
हालांकि इस समय के हालातों को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में सीधी टक्कर दिखाई दे रही है। इससे पहले सपा भी काफी मजबूत दिखाई दे रही थी लेकिन अब उसका जनाधार काफी कम होता हुआ दिखाई दे रहा है। ऐसा माना जाता है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में लोन ऑर्डर सबसे ही कमजोर रहता है। 
जबकि अगर लॉयन ऑर्डर की बात की जाए लोगों की सुरक्षा की बात की जाए तो  बसपा प्रमुख मायावती का नाम सबसे पहले लिया जाता है हालांकि वर्तमान सरकार ने भी लॉयन ऑर्डर के मामले में कुछ कदम ठीक-ठाक उठाए हैं लेकिन भाजपा की सरकार में कुछ ऐसे कारनामे भी हुए हैं जिनसे भाजपा को भारी नुकसान भी हो सकता है। 
बढ़ती महंगाई और हाथरस जैसे कांड ने भाजपा को कटघरे में खड़ा कर दिया है। हालांकि इस समय सभी पार्टियां जातियों को तोड़ने और जोड़ने में लगी हैं। इसका लाभ किस पार्टी को मिलता है यह तो समय ही बता पाएगा।
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